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जुल्‍म की कहानी सुन आप की भी भर आएंगी आंखें, नोबेल पुरस्‍कार विजेता नादिया पर

नादिया के पिता और भाइयों को आईएस के आतंकियों ने उसके ही सामने मौत के घाट उतार दिया था। आईएस के चंगुल से निकलकर वह किसी तरह से जर्मनी पहुंचने में कामयाब रही।

नई दिल्‍ली । यजीदी महिला नादिया मुराद को हाल ही में नोबेल शांति पुरस्‍कार से नवाजा गया है। 24 वर्षीय नादिया आईएसआईएस के जुल्‍म की जीती जागती मिसाल हैं। उन्‍होंने वह सब कुछ जो हम सुनते हैं उसको न सिर्फ देखा बल्कि सहा भी है। नादिया का नाम दुनिया ने नोबेल पुरस्‍कार हासिल करने से पहले लगभग तीन वर्ष पहले उस वक्‍त सामने आया था जब संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद में अपने ऊपर हुए जुल्‍म को बताते हुए बिलख-बिलख कर रो पड़ी थीं। उस वक्‍त नादिया ने जो कुछ बयां किया था उसको सुनकर किसी भी रुह कांप उठेगी। उस वक्‍त यूनाइटेड नेशन सिक्योरिटी काउंसिल के सदस्‍यों ने इस यजीदी लड़की के हौंसलों की दाद दी थी।

नादिया मुराद बसी ताहा

उस वक्‍त महज 21 वर्ष की रही नादिया मुराद बसी ताहा ने बताया था कि जब वह महज 19 वर्ष की थी तब उसने आईएस के चंगुल में उसने तीन माह बिताए थे। उसके लिए यह तीन नरक की आग में जलने जैसा था। इन तीन माह के अंदर उसने हर रोज अपने ऊपर अत्याचार होते देखा। इराक की रहने वाली इस लड़की ने बताया कि आईएस आतंकी उसको गांव से अगवा कर आतंकियो के गढ़ मोसुल ले गए थे। उसे एक बिल्डिंग में बंधक बनाकर रखा गया था। इस दौरान एक गार्ड ने उसके साथ तब तक दुष्‍कर्म किया जब तक वह बेहोश नहीं हो गई। उसने काउंसिल को बताया कि यह आतंकवादी संगठन महिलाओं और लड़कियों का इस्तेमाल सिर्फ अपनी हवस मिटाने के लिए ही करता था। आपको बता दें कि नादिया का जन्म इराक के कोजो में 1993 में हुआ था।

जुल्म की दास्तां

अपने ऊपर हुए जुल्म की दास्तां बताते हुए उसने बताया कि जब उसको अगवा कर गार्ड के सम्मुख छोड़ दिया गया तो गार्ड ने उससे अपने कपड़े उतारने के लिए कहा। विरोध करने पर उसने उसके साथ मारपीट भी की और यहां से उसके जुल्म की कहानी की शुरुआत हुई। नादिया ने बताया कि यह आतंकी महिलाओं और लड़कियों को तोहफे के तौर पर अपने साथियों में बांटते हैं। नादिया ने इस आतंकी संगठन के कब्जे में जो तीन माह गुजारे उसको बताना उसके लिए सहज नहीं था। उसने काउंसिल के सदस्यों से अपील की कि इस संगठन को जल्द से जल्द खत्म कर दिया जाए।

यजीदी वहां पर अल्पसख्ंयक

यहां पर आपको बता दें कि यजीदी वहां पर अल्पसख्ंयक हैं। इराक में इनकी संख्या लगभग पांच लाख है। नादिया आईएस द्वारा बंधक बनाए जाने वाली कई लड़कियों में से कुछ खुशनसीब जरूर निकली। ऐसा इसलिए क्‍योंकि वह मौका पा कर वहां से भागने में कामयाब रही नादिया के पिता और भाइयों को आईएस के आतंकियों ने उसके ही सामने मौत के घाट उतार दिया था। आईएस के चंगुल से निकलकर वह किसी तरह से जर्मनी पहुंचने में कामयाब रही। यूएन में नादिया ने अपने ऊपर हुए जुल्म को बयां करते हुए बताया था कि उसको इस दौरान कई बार खरीदा और बेचा गया। लेकिन कुछ माह बाद वह आईएस के चंगुल से निकलने में कामयाब रही और जर्मनी पहुंच गई। नादिया ने इस दौरान यहां तक कहा था कि आतंकी जैसा चाहते थे उसका इस्‍तेमाल करते थे। चंगुल में रहते हुए उसको बुरी तरह से मारा-पीटा भी गया था। ये जुल्‍म सहने वाली कोई अकेली लड़की नहीं थी बल्कि उस जैसी कई दूसरी भी थीं। यहां पर ये भी याद रखना होगा कि नोबेल शांति पुरस्‍कार से पहले वर्ष 2016 में संयुक्त राष्ट्र ने उसको गुडविल एंबेस्डर भी बनाया था।

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